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#bihar: नालंदा विश्वविद्यालय ने दीक्षांत 2026 में अपनाई भारतीय और सतत परंपरा….

Bykhabretv-raj

Mar 29, 2026

 

 

 

 

 

 

 

 

नालंदा विश्वविद्यालय ने दीक्षांत 2026 में अपनाई भारतीय और सतत परंपरा; ‘अहिंसा रेशम’और खादी पर आधारित विशेष अकादमिक परिधान….

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार (29 मार्च 2026): नालन्दा विश्वविद्यालय आगामी मंगलवार को अपने द्वितीय दीक्षांत समारोह का आयोजन करने जा रहा है, जिसमें भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होंगी। इस अवसर पर विश्वविद्यालय ने परंपरागत दीक्षांत परिधानों में एक महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए भारतीयता और स्थिरता को केंद्र में रखते हुए विशेष अकादमिक परिधान तैयार किए हैं।

भारी मखमली औपनिवेशिक गाउन की परंपरा से परे नालंदा विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों के लिए खादी के परिधान अपनाए हैं, जबकि विशिष्ट अतिथियों और आगंतुकों के लिए अहिंसा रेशम (पीस सिल्क), जिसमें बिहार का प्रसिद्ध भागलपुरी रेशम भी शामिल है, से निर्मित वस्त्र तैयार किए गए हैं। अहिंसा रेशम एक पर्यावरण-अनुकूल और क्रूरता-मुक्त कपड़ा है, जिसमें रेशम के कीड़ों को बिना हानि पहुँचाए उनके कोकून से स्वाभाविक रूप से बाहर आने दिया जाता है। यह कपडा हल्का, आरामदायक और स्थानीय जलवायु के अनुरूप होता है।

यह पहल अकादमिक गरिमा को बनाए रखने के साथ-साथ भारतीय परंपराओं और पर्यावरणीय मूल्यों के साथ भी सामंजस्य स्थापित करती है। परिधानों का डिज़ाइन, रंग-संयोजन और कलात्मकता नालन्दा विश्वविद्यालय के लोगो में निहित “द नालन्दा वे” की मूल भावना से प्रेरित है, जो मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व को दर्शाती है। नालंदा विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह, मानव आकृतियों से निर्मित एक वृक्ष, इसी दर्शन को साकार करता है, जो सतत विकास, ज्ञान-साझेदारी और विविधता में एकता का प्रतीक है।

इस अवसर पर अतिथियों को प्रदान किए जाने वाले अंगवस्त्र बिहार के नपुरा और बसवन बिगहा के बुनकरों से विशेष रूप से मंगाए गए हैं। साथ ही, ‘बावन बूटी’ जैसी पारंपरिक बुनाई कला को भी इस पहल में प्रमुखता दी गई है, जो बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। यह प्रयास ‘सहभागिता’ पहल के अंतर्गत स्थानीय महिला समूहों और कारीगरों के साथ मिलकर किया गया है।

इन पहलों के माध्यम से नालंदा विश्वविद्यालय अपने दीक्षांत परंपराओं को एक नया स्वरूप दे रहा है, और साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास और सामुदायिक सहभागिता के अपने मूल्यों को भी सशक्त रूप से स्थापित कर रहा है।