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#ख़बरें Tv: संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिन्दी की प्रस्तावना के साथ नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन….

Bykhabretv-raj

Jan 10, 2026

 

 

 

 

 

 

संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिन्दी की प्रस्तावना के साथ नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन….

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, जनवरी 10, 2026; नालंदा विश्वविद्यालय में आज “हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद” विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ. इस संगोष्ठी ने नालंदा को संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी की भूमिका और संभावनाओं पर महत्वपूर्ण वैश्विक विमर्श के एक प्रमुख अकादमिक मंच के रूप में प्रस्तुत किया.
समापन दिवस पर आयोजित पंचम सत्र “उच्च शिक्षण संस्थानों का योगदान” तथा षष्ठ सत्र “हिन्दी सेवी संस्थाओं का योगदान” में इस बात पर बल दिया गया कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों की साझा भागीदारी के बिना हिन्दी को वैश्विक स्तर पर सशक्त करना संभव नहीं है.
अंतिम अकादमिक सत्र “संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी: एक प्रस्तावित मार्ग” पर केंद्रित रहा, जिसे प्रो. विनोद कुमार मिश्र, पूर्व महासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरीशस ने प्रस्तुत किया और लिस्बन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शिव कुमार सिंह ने हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में स्थापित करने के पक्ष में सशक्त रूप से अपने विचार और तर्क रखे. इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र की भाषा नीति के ऐतिहासिक विकास-1945 में पाँच भाषाओं की स्वीकृति तथा 1973 में अरबी भाषा के समावेश- पर चर्चा करते हुए यह रेखांकित किया गया कि किसी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने की प्रक्रिया दीर्घकालीन कूटनीति, वित्तीय सहयोग और बहुपक्षीय समर्थन पर आधारित होती है. अरबी भाषा का अनुभव हिन्दी के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया.

 

 

विमर्श में हिन्दी की वैश्विक उपस्थिति, विशाल भाषी समुदाय, तकनीक और इंटरनेट के माध्यम से बढ़ते प्रसार तथा ‘हिंदी@यू एन’ पहल के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी की वास्तविक उपस्थिति को महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया गया.
इस अवसर पर कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि, “संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी केवल भाषायी गौरव का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यतागत उपस्थिति और बौद्धिक आत्मविश्वास की प्रगति का भी प्रतीक है. उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संस्थागत तैयारी तथा दीर्घकालीन रणनीति अनिवार्य है. वैश्विक परिदृश्य में उभर रहे ‘ग्लोबल साउथ’ के महत्त्व के साथ यह प्रस्ताव और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है.”
सत्र के दौरान, नालंदा विश्वविद्यालय और केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान (CIHTS), सारनाथ के बीच शैक्षणिक एवं बौद्धिक सहयोग को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया. दोनों संस्थानों के मध्य शैक्षणिक और शोध आदान–प्रदान को प्रोत्साहित करने हेतु एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए. यह एमओयू नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी एवं केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान के कुलपति प्रोफेसर डब्ल्यू. डी. नेगी द्वारा आज विश्वविद्यालय के राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में संपन्न हुआ. यह साझेदारी ज्ञान–परम्पराओं के संवाद, अंतर्विषयक शोध और अकादमिक सहयोग को नई दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी.
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हिन्दी को वैश्विक विमर्श, कूटनीति और ज्ञान–परम्पराओं के केंद्र में स्थापित करने के साझा संकल्प के साथ हुआ- जो नालंदा की ऐतिहासिक वैश्विक विरासत को समकालीन संदर्भ में आगे बढ़ाने का काम करेगा.