नालन्दा विश्वविद्यालय में 21–22 सितम्बर को ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद..
बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन करेंगे उद्घाटन; देशभर के शिक्षाविद् एवं विद्वान भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत की संकल्पना पर करेंगे विचार-विमर्श..

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा | 19 सितम्बर 2026: नालन्दा विश्वविद्यालय, राजगीर एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 21–22 सितम्बर 2026 को ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया जा रहा है। परिसंवाद का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर विमर्श करते हुए शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, सामाजिक विकास, सतत् विकास और वैश्विक चुनौतियों के समाधान में उसकी संभावित भूमिका को समझना है।
परिसंवाद का उद्घाटन 21 सितम्बर को प्रातः 11 बजे नालन्दा विश्वविद्यालय के विश्वमित्रालय सभागृह में होगा। उद्घाटन सत्र में माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करेंगे। नालन्दा विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी विषय प्रवर्तन करेंगे। प्रतिष्ठित शिक्षाविद् प्रो. रमेश भारद्वाज परिसंवाद की प्रस्तावना प्रस्तुत करेंगे, जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रो. भूषण पटवर्धन विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखेंगे। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी का सारस्वत उद्बोधन भी उद्घाटन सत्र का प्रमुख हिस्सा होगा।
उद्घाटन सत्र के पश्चात् विशेष सत्र में ‘नालन्दा-बोध’ व्याख्यान आयोजित किया जाएगा, जिसमें डॉ. अतुल कोठारी ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और नालंदा-बोध’ विषय पर व्याख्यान देंगे।
दो दिवसीय परिसंवाद में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा एवं अनुसंधान के बीच समन्वय, भारतीय भाषाओं को ज्ञान-सृजन और अनुसंधान की सक्रिय भाषाओं के रूप में विकसित करने, भारतीय ग्रंथों के डिजिटलीकरण, अनुवाद एवं आधुनिक शोध-पद्धतियों से अध्ययन तथा पर्यावरण संरक्षण, सतत् विकास, सामाजिक समावेशन और तकनीकी प्रगति जैसे समकालीन विषयों पर विचार-विमर्श होगा। वेद, उपनिषद्, दर्शन, बौद्ध तर्कशास्त्र, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, व्याकरण, स्थापत्य, कृषि, जल-प्रबंधन, कला, साहित्य और लोकज्ञान जैसी विविध ज्ञान-विधाओं के योगदान पर भी चर्चा की जाएगी।
नालन्दा विश्वविद्यालय में इस परिसंवाद का आयोजन विशेष अकादमिक महत्त्व रखता है। प्राचीन नालन्दा ज्ञान, तर्क, संवाद और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक आदान-प्रदान का प्रमुख केंद्र रहा है। आधुनिक नालन्दा विश्वविद्यालय इसी विरासत से प्रेरणा लेते हुए अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग, अंतर्विषयी अध्ययन और समकालीन ज्ञान-सृजन को आगे बढ़ा रहा है। विश्वविद्यालय का ‘सहभागिता’ कार्यक्रम भी ज्ञान और समाज के बीच संवाद को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
राष्ट्रीय परिसंवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि के बीच सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने तथा विकसित भारत 2047 की संकल्पना को ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, मानवीय मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास किया जाएगा। यह आयोजन देशभर के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए विचारों के आदान-प्रदान तथा समकालीन भारत के लिए ज्ञान की नई संभावनाओं पर संवाद का मंच प्रदान करेगा।
