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#bihar: नालंदा विश्वविद्यालय में ‘दक्षिणीय सहयोग के माध्यम से वन हेल्थ को गति देने वाले क्षेत्रीय कारकों’ पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार..

Bykhabretv-raj

Nov 3, 2026

 

 

 

 

नालंदा विश्वविद्यालय में ‘दक्षिणीय सहयोग के माध्यम से वन हेल्थ को गति देने वाले क्षेत्रीय कारकों’ पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार..

_बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली, उभरती तकनीकों, जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी और क्षेत्रीय सहयोग पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए…

 

 

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | मंगलवार, 3 नवंबर 2026: नालंदा विश्वविद्याल में “विश्व वन हेल्थ दिवस” के अवसर पर ‘दक्षिणीय (साउथ-साउथ) सहयोग के माध्यम से वन हेल्थ को गति देने वाले क्षेत्रीय कारक’ विषय पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज एंड लिटरेचर/ह्यूमैनिटीज के अंतर्गत साइंस, टेक्नोलॉजी एवं पालिसी स्टडीज डिपार्टमेंट द्वारा आयोजित इस वेबिनार में भारत, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल सहित कई अन्य देशों के विशेषज्ञों एवं नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। इसमें मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य से जुड़ी आपसी चुनौतियों तथा विशेष रूप से विकासशील देशों की प्राथमिकताओं पर चर्चा की गई।

उद्घाटन सत्र में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि वन हेल्थ को केवल जनस्वास्थ्य से जुड़ा विषय मानकर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह आर्थिक विकास, तकनीकी समानता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने भारत में तेजी से विकसित हो रही जैव-अर्थव्यवस्था तथा टीका निर्माण, रोगों की जांच और जैव-निर्माण के क्षेत्र में बढ़ती क्षमताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत किफायती स्वास्थ्य सेवाओं और तकनीकों के विकास के साथ अन्य विकासशील देशों को भी इनका लाभ पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समान विकास संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे देशों के बीच ज्ञान, संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का आदान-प्रदान बढ़ाने के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को वैश्विक वन हेल्थ अभियान का प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए।

भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय की वैज्ञानिक डॉ. संगीता अग्रवाल ने राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन और ‘वन प्लैनेट, वन हेल्थ’ की अवधारणा के महत्व पर प्रकाश डाला। कोविड-19 महामारी से मिले अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भविष्य में बीमारियों के प्रकोप को रोकने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल, एकीकृत निगरानी व्यवस्था, नियामक तैयारियां और समय रहते बीमारी की पहचान बेहद जरूरी हैं। उन्होंने उच्च सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं के नेटवर्क, 54 प्राथमिकता वाले रोगजनकों की पहचान, राष्ट्रीय वन हेल्थ सभा तथा युवाओं की भागीदारी से जुड़े IDEA और वन हेल्थ हैकाथॉन जैसे प्रयासों की जानकारी भी दी। उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचार का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस. आर. राव ने वन हेल्थ की तैयारियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पूर्वानुमान आधारित विश्लेषण, जीनोमिक्स, मेटाजीनोमिक्स, किफायती जांच सुविधाओं और अपशिष्ट जल की निगरानी जैसी उभरती तकनीकों की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियों के विकास तथा तकनीकों को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अपनाने, संयुक्त रूप से उनकी जांच करने और क्षेत्रीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) को भी ऐसा महत्वपूर्ण विषय बताया, जिसके समाधान के लिए देशों के बीच निरंतर सहयोग जरूरी है।

नालंदा विश्वविद्यालय के डीन प्रोफेसर डी. वेंकट राव ने पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक वन हेल्थ विज्ञान के बीच संबंधों पर विचार रखे। चरक संहिता का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मानव शरीर और प्राकृतिक पर्यावरण को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना गया है। उन्होंने कहा कि वन हेल्थ की आधुनिक अवधारणा भी मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य की इसी परस्पर निर्भरता को स्वीकार करती है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने के लिए व्यवस्थित शोध, वैज्ञानिक परीक्षण और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग पर बल दिया।

भूटान के FCBL के निदेशक श्री छिमे छेवांग ने अल नीनो और जलवायु परिवर्तनशीलता के मानव एवं पशु स्वास्थ्य, कृषि और प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की। हिमालयी क्षेत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने वर्षा के बदलते स्वरूप, सूखे, ग्लेशियरों के पिघलने और जल उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल खाद्य सुरक्षा ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। ऐसे में साझा प्राकृतिक पारिस्थितिकी वाले देशों के बीच समन्वित निगरानी और जोखिम का आकलन आवश्यक है।

संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वरिष्ठ सलाहकार श्री अभिमन्यु सिंह ने वन हेल्थ में दक्षिण-दक्षिण सहयोग के आर्थिक पक्ष पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसानों और कृषि समुदायों को भी इस विषय से जुड़ी नीतिगत चर्चाओं में उचित स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि मानव, पशु और पर्यावरण के बीच उत्पन्न होने वाले जोखिमों का सीधा असर उन पर पड़ता है। उन्होंने महामारी की रोकथाम पर लगभग 11.5 अरब अमेरिकी डॉलर और महामारी के प्रबंधन पर लगभग 30 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च होने के अनुमानों का उल्लेख करते हुए कहा कि बीमारी फैलने के बाद उससे निपटने की तुलना में पहले से रोकथाम करना कहीं अधिक किफायती है। उन्होंने कृषि पद्धतियों, पशु आहार में एंटीबायोटिक के उपयोग, भूमि के असंतुलित इस्तेमाल और रोगाणुरोधी प्रतिरोध से जुड़ी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला।

पश्चिम बंगाल के विद्यासागर विश्वविद्यालय के डॉ. सुरोजित दास ने वन्यजीवों में रोगाणुरोधी प्रतिरोध के उभरते खतरे पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि दूषित जल, औद्योगिक एवं शहरी अपशिष्ट, कृषि कचरे और अन्य पर्यावरणीय माध्यमों से वन्यजीवों में प्रतिरोधी सूक्ष्मजीवों का प्रसार हो सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय रोगाणुरोधी प्रतिरोध रणनीतियों में वन्यजीवों की निगरानी को शामिल करने तथा पर्यावरणीय निगरानी और विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई।

वेबिनार ने एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ क्षेत्रीय साझेदारी, विभिन्न विषयों में शोध और निरंतर संवाद के माध्यम से वन हेल्थ को आगे बढ़ाने की नालंदा विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। वैज्ञानिक ज्ञान, सार्वजनिक नीति, पारंपरिक समझ और तकनीकी नवाचार को एक साथ लाकर विश्वविद्यालय नई तरह की बीमारियों, रोगाणुरोधी प्रतिरोध, जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी साझा चुनौतियों के समाधान में सहयोग को मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत है। इस चर्चा ने संस्थागत साझेदारी और व्यावहारिक सहयोग के नए अवसरों का भी उल्लेख किया, जो वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात पूरी दुनिया एक परिवार है की भावना को आगे बढ़ाने का काम करते हैं।