• Thu. Sep 10th, 2026

#bihar: नालंदा विश्वविद्यालय में पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह का चार दिवसीय विशिष्ट आवासीय कलाकार- प्रवास…

Bykhabretv-raj

Sep 9, 2026

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नालंदा विश्वविद्यालय में पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह का चार दिवसीय विशिष्ट आवासीय कलाकार- प्रवास…

 

 

 

 

ख़बरें टी वी : पिछले 16 वर्षो से ख़बर में सर्वश्रेष्ठ.. ख़बरें टी वी ” आप सब की आवाज ” …आप या आपके आसपास की खबरों के लिए हमारे इस नंबर पर खबर को व्हाट्सएप पर शेयर करें… ई. शिव कुमार, “ई. राज”- नेशनल टीवी रिपोर्टर–इंडिया Tv, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ स्टेट, इंडिया News, सम्पूर्ण नालंदा जिला -9334598481. नोट :- मेरे अलावा इन चैनलों में और कोई नालंदा जिले से रिपोर्टर नहीं है, अगर कोई बोलता है तो हमें कॉल करके शिकायत करें…

.. हमारी मुहिम .. नशा मुक्त हर घर .. बच्चे और नवयुवक ड्रग्स छोड़ें .. जीवन बचाएं, जीवन अनमोल है .. नशा करने वाले संगति से बचे ..

… हमारे प्लेटफार्म पर गूगल द्वारा प्रसारित विज्ञापन का हमारे चैनल के द्वारा कोई निजी परामर्श नहीं है, वह स्वतः प्रसारित होता है …

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | बुधवार, 9 सितंबर 2026: नालंदा विश्वविद्यालय ने पद्म विभूषण से सम्मानित एवं राज्यसभा की पूर्व सांसद डॉ. सोनल मानसिंह, विशिष्ट कलाकार- आवासीय, के साथ शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की एक श्रृंखला आयोजित की, जिसके अंतर्गत आज विश्वामित्रालय सभागार में ‘नालंदा स्पिरिट व्याख्यान’ भी आयोजित किया गया।

नालंदा विश्वविद्यालय में डॉ. मानसिंह का कलाकार-निवासी के रूप में प्रवास 7 सितंबर की शाम कलाकार-निवासी कार्यक्रम के औपचारिक उद्घाटन के साथ शुरू हुआ। इसका उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने किया। अपने संबोधन में प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा, “सोनल मानसिंह की विशिष्ट कलाकार-निवासी के रूप में नियुक्ति से हमारे विद्यार्थियों को एक जीवंत किंवदंती से नृत्य की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिलेगा। हमारे प्रधानमंत्री ने मन के उपनिवेशीकरण से मुक्ति का आह्वान किया है। विशिष्ट आवासीय कलाकार कार्यक्रम इस दिशा में आगे बढ़ने की एक महत्वपूर्ण पहल है।”

उद्घाटन अवसर पर अपने विशेष संबोधन में डॉ. मानसिंह ने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में गुरु शिष्य के मन में ज्ञान और जिज्ञासा की ज्योति प्रज्वलित करता है।

विश्वविद्यालय में अपने प्रवास के दूसरे दिन डॉ. मानसिंह ने संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों से संवाद किया। इस दौरान भारत की कलात्मक और सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता और उनके निरंतर विकास पर चर्चा हुई। रामायण का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसकी कथा विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों तक पहुँची और लोक, जनजातीय, शास्त्रीय, शास्त्रीय ग्रंथों की परंपरा तथा साहित्य में इसके अनेक रूप विकसित हुए, लेकिन इसकी मूल पहचान बनी रही।

 

 

 

 

रामायण को ‘जीवंत परंपरा’बताते हुए डॉ. मानसिंह ने कहा कि अलग-अलग संस्कृतियाँ लगातार एक-दूसरे से प्रभावित होती रही हैं और समय के साथ एक-दूसरे को नया रूप देती रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से सीता के चरित्र, उनकी शक्ति और अपनी राह चुनने की क्षमता पर विचार साझा किए। उन्होंने ‘लीला’ की व्यापक दार्शनिक अवधारणा पर भी बात की, जो व्यक्ति के उद्देश्य, धर्म और व्यापक सभ्यतागत कथा के बीच संबंध को समझने का एक माध्यम है।

संवाद के दौरान भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं के विकास और उनके आपसी संबंधों पर भी चर्चा हुई। कथक और भरतनाट्यम से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ. मानसिंह ने कहा कि कला की परंपराएँ कभी पूरी तरह अलग-अलग नहीं रही हैं। कलाकारों, गुरुओं और विचारों के एक स्थान से दूसरे स्थान तक आने-जाने से अभिनय, लय, कथावाचन, मुद्राओं और संगीत की अभिव्यक्ति में लगातार आदान-प्रदान होता रहा है। उन्होंने कहा कि कोई परंपरा इसलिए जीवित नहीं रहती कि वह बदलती नहीं है, बल्कि इसलिए जीवित रहती है क्योंकि वह समय के साथ अभिव्यक्ति के नए रूप खोजती रहती है।

डॉ. मानसिंह ने महिला कलाकारों के ऐतिहासिक अनुभवों और औपनिवेशिक काल के दौरान कला एवं प्रदर्शन परंपराओं के प्रति बदलती धारणाओं पर भी विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि इन परंपराओं को उनके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के साथ समझना आवश्यक है।

इस संवाद ने विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों को कला, इतिहास, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं को एक साथ समझने का अवसर दिया। यह नालंदा विश्वविद्यालय की समन्वित और चिंतनशील शिक्षा की भावना के अनुरूप रहा।

आज सुबह डॉ. मानसिंह ने ‘कला, शास्त्रीय परंपराएँ और प्राचीन नालंदा की आत्मा’विषय पर ‘नालंदा स्पिरिट व्याख्यान’दिया। उन्होंने कला की अभिव्यक्ति, शास्त्रीय परंपराओं और भारत की ज्ञान-विरासत के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि कला और प्रदर्शन परंपराएँ सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखने, ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने और सभ्यताओं के बीच संवाद को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।