नालंदा विश्वविद्यालय में ‘रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस’ पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन…

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | गुरुवार, 13 अगस्त 2026: नालंदा विश्वविद्यालय में आज राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में “रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन, तकनीकी बदलाव, वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों और अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक शासन की बढ़ती जरूरत के बीच प्रोफेसर थॉमस पोगे के विचारों और उनके काम की आज की प्रासंगिकता पर चर्चा हुई।
उद्घाटन सत्र में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने प्रोफेसर थॉमस पोगे के व्यापक अकादमिक योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पोगे का काम दर्शनशास्त्र से जुड़ा होने के बावजूद अर्थशास्त्र, सामाजिक न्याय, अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीति विज्ञान जैसे कई क्षेत्रों से सीधे जुड़ता है और हमारे समय के कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने लाता है।
प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा कि पोगे का शोध अंतरराष्ट्रीय कानून, अंतरराष्ट्रीय न्याय और वैश्विक उत्तर तथा वैश्विक दक्षिण के बीच बनी हुई खाई जैसे विषयों को एक साथ देखने का अवसर देता है। उन्होंने आगे की राह तलाशने के लिए ऐसे विमर्शों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने ज्ञान के सह-निर्माण के महत्व को भी रेखांकित किया और कहा कि अलग-अलग देशों और विषयों के संदर्भ में विशिष्ट शोध-परिणाम तैयार किए जा सकते हैं, जो वैश्विक ज्ञान की दिशा में उपयोगी योगदान दे सकते हैं। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में इस तरह की व्यापक और बहुविषयक चर्चा आयोजित होने पर प्रसन्नता भी व्यक्त की।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रोफेसर थॉमस पोगे, येल विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के लिटनर प्रोफेसर तथा ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम के संस्थापक निदेशक, ने नालंदा में उपस्थित होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “मैं नालंदा आकर बहुत खुश हूं और इन महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा करने के लिए यहां आए सभी लोगों का आभारी हूं। भारत के साथ मेरा एक गहरा जुड़ाव भी है, क्योंकि एक तरह से मेरी बौद्धिक यात्रा की शुरुआत भारत से ही हुई थी। पीछे मुड़कर देखता हूं तो इस बात की खुशी है कि हम आज यहां ऐसी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन गरीबी के खिलाफ हमने जितनी प्रगति की है, उसे लेकर चिंता भी होती है। हमें यह सोचने की जरूरत है कि हम प्रगति से क्या समझते हैं—सिर्फ गरीबी में कमी या असमानता में वास्तविक कमी भी। उम्मीद है कि ये चर्चाएं हमें गरीबी, असमानता और वैश्विक न्याय को समझने वाली संस्थाओं और तरीकों पर अधिक गंभीरता से विचार करने में मदद करेंगी।”
उन्होंने यह भी कहा, “अगर हम गरीबी के खिलाफ हुई प्रगति पर गर्व करना चाहते हैं, तो हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि गरीबी कम हुई है या नहीं, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि असमानता कम हुई है या नहीं। केवल आर्थिक विकास का लाभ सभी तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। हमें यह देखना होगा कि आर्थिक विकास का लाभ सबसे अधिक वंचित लोगों तक किस हद तक पहुंच रहा है और गरीबी तथा असमानता को मापने के हमारे तरीके उनकी वास्तविक परिस्थितियों को कितनी सही तरह से सामने रखते हैं।”
संगोष्ठी में तीन प्रमुख सत्रों के माध्यम से गरीबी, विकास और वैश्विक न्याय; नैतिकता, वैश्विक शासन और संस्थागत जवाबदेही; तथा बौद्धिक संपदा अधिकार, नवाचार और वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसके बाद वैलेडिक्टरी सत्र आयोजित किया गया।
इस अवसर पर विभिन्न अकादमिक, शोध और नीति संस्थानों से जुड़े कई प्रतिष्ठित विद्वानों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। इनमें प्रोफेसर अशोक आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय; प्रोफेसर सैकत सिन्हा रॉय, जादवपुर विश्वविद्यालय; प्रोफेसर एस.के. मोहंती, नालंदा विश्वविद्यालय; प्रोफेसर नित्या नंदा, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; प्रोफेसर जोस नंधिक्कारा, धर्माराम विद्या क्षेत्रम एवं क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु; डॉ. सौम्यदीप चौधरी, एडमास यूनिवर्सिटी, कोलकाता एवं PPGF; श्री सैयद अरसलान अली, यूनिवर्सिटी ऑफ लीपजिग; प्रोफेसर अरविंद कुमार, नालंदा विश्वविद्यालय; प्रोफेसर के.जे. जोसेफ, गुलाटी इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड टैक्सेशन, तिरुवनंतपुरम; प्रोफेसर शेषाद्रि चारी, पूर्व संपादक, ऑर्गनाइज़र; डॉ. बी. चेंगप्पा, इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेम्पररी स्टडीज, बेंगलुरु; डॉ. सब्यसाची साहा, RIS, नई दिल्ली; तथा प्रोफेसर अलख शर्मा, इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट सहित अन्य विशेषज्ञ शामिल रहे।
