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#bihar: नालंदा विश्वविद्यालय में ‘समावेशी विकास के लिए सहकारिता’ विषय पर विशेष व्याख्यान…

Bykhabretv-raj

Aug 8, 2026

 

 

 

 

 

 

 

नालंदा विश्वविद्यालय में ‘समावेशी विकास के लिए सहकारिता’ विषय पर विशेष व्याख्यान…

 

 

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा | 08 अगस्त 2026 (शनिवार): नालंदा विश्वविद्यालय में विगत शुक्रवार को ‘समावेशी विकास के लिए सहकारिता’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान सहकार भारती के संस्थापक सदस्य तथा भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय निदेशक बोर्ड के सदस्य, राष्ट्रीय आवास बैंक के निदेशक एवं भारत सरकार द्वारा गठित तीन-स्तरीय अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना (STCS) की प्रासंगिकता, उपयोगिता और निरंतरता के अध्ययन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति के सदस्य श्री सतीश मराठे ने दिया। व्याख्यान में विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस एंड पीस स्टडीज, स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट स्टडीज तथा अर्थशास्त्र विभाग के शिक्षक और विद्यार्थी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

अपने प्रारंभिक संबोधन में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने समावेशी विकास के संदर्भ में सहकारिता के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से निपटने में लोगों की भागीदारी और सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देने में सहकारी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

व्याख्यान में श्री सतीश मराठे ने भारत में सहकारिता आंदोलन के विकास और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में इसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने सहकारी संस्थाओं को ऐसी जन-केंद्रित आर्थिक संस्थाओं के रूप में रेखांकित किया, जो अपने सदस्यों और स्थानीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। उन्होंने भारत में सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले विभिन्न प्रमुख व्यक्तित्वों के योगदान का उल्लेख करते हुए इसके लोकतांत्रिक संचालन, नैतिक मूल्यों और सामूहिक हित पर आधारित दृष्टिकोण को भी रेखांकित किया।

 

 

श्री मराठे ने भारत और विभिन्न देशों के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कृषि, बैंकिंग, डेयरी, स्वास्थ्य, आवास और मत्स्य पालन सहित कई क्षेत्रों में सहकारिता की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सहकारी संस्थाएं तब अधिक प्रभावी ढंग से काम करती हैं, जब उनके सदस्य उनके संचालन और निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इसके लिए ऐसा कानूनी, वित्तीय और नीतिगत वातावरण भी आवश्यक है, जो सहकारी संस्थाओं को अपनी मूल सहकारी भावना को बनाए रखते हुए टिकाऊ और पेशेवर ढंग से संचालित आर्थिक संस्थाओं के रूप में विकसित होने का अवसर दे।

उन्होंने विशेष रूप से किसान सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सहकारिता को केवल ऋण और कृषि इनपुट तक सीमित रखने के बजाय कृषि-प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन और व्यापक बाजारों तक पहुंच जैसे क्षेत्रों से जोड़ना आवश्यक है। भारत और अन्य देशों के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने बताया कि बैंकिंग, स्वास्थ्य, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और कृषि विपणन जैसे क्षेत्रों में सहकारी संस्थाएं स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने, समुदायों के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाने और आर्थिक एवं सामाजिक संकट के समय उन्हें सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

विशेष व्याख्यान का समापन समावेशी विकास, खाद्य सुरक्षा, वित्तीय पहुंच और सतत विकास के संदर्भ में सहकारिता की निरंतर प्रासंगिकता पर चर्चा के साथ हुआ। श्री मराठे ने समकालीन विकास चुनौतियों से निपटने में लोगों की भागीदारी और सामूहिक आर्थिक प्रयासों के महत्व को रेखांकित किया।

व्याख्यान के बाद शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के साथ संवादात्मक सत्र भी हुआ, जिसमें भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में सहकारिता आंदोलन के व्यावहारिक और विकासात्मक पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।