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#bihar: माननीय राज्यपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन किया….

Bykhabretv-raj

Sep 21, 2026

माननीय राज्यपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन किया, भारतीय ज्ञान परंपरा को विकसित भारत के निर्माण से जोड़ने का आह्वान…..

 

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, बिहार | सोमवार, 21 सितम्बर 2026: बिहार के माननीय राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैय्यद अता हसनैन ने आज नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ का उद्घाटन किया।

दो दिनों तक चलने वाले इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपति, निदेशक, शिक्षाविद्, शोधकर्ता तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। परिसंवाद का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और विकसित भारत की व्यापक विकास-दृष्टि से जोड़ते हुए उसके विविध आयामों पर विमर्श करना है।

नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता है या नहीं, बल्कि यह है कि इसे आगे कैसे ले जाया जाए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित न मानते हुए इसे दक्षिण एशिया और व्यापक एशियाई सभ्यतागत विरासत से जुड़ी साझा ज्ञान-परंपरा के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि नालंदा में विभिन्न देशों से आए विद्यार्थियों को नालंदा की ज्ञान-दृष्टि और भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराने के लिए विशेष पाठ्यक्रमों एवं पहलों पर कार्य किया जा रहा है। उन्होंने ज्ञान को अलग-अलग विषयों में विभाजित करने के बजाय अंतर्विषयक दृष्टिकोण अपनाने तथा प्रमाण, तर्क, संवाद और विभिन्न दृष्टिकोणों के सम्मान को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता रेखांकित की।

प्रोफेसर चतुर्वेदी ने शास्त्रार्थ की नालंदा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य किसी बहस में जीत या हार नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से सामूहिक रूप से ज्ञान का विस्तार करना है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक शांति, सह-अस्तित्व और बहुलतावादी दृष्टि से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

प्रख्यात शिक्षाविद् प्रोफेसर रमेश भारद्वाज ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भारत-केंद्रित बनाने की दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने भारतीय समाज की दीर्घकालीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा के पुनर्स्थापन तथा उसे प्रमाण, साहित्यिक स्रोतों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा देश के अनेक विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित केंद्रों, शोध, कार्यशालाओं और शैक्षणिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने नालंदा की धरती को भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा से जोड़ते हुए इस दो दिवसीय विमर्श को आगे की दिशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण बताया।

यूजीसी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर भूषण पटवर्धन ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान को केवल गौरव या विरासत के रूप में देखने के बजाय उसे वर्तमान चुनौतियों और नए विचारों के स्रोत के रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने ज्ञान के निरंतर विकास, संवाद और बौद्धिक जिज्ञासा को महत्वपूर्ण बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थी प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक संदर्भों में समझें और उनसे नवाचार की संभावनाएँ तलाशें।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान वैश्विक चुनौतियों—पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य और सतत जीवन-पद्धति—के संदर्भ में प्रासंगिक बताया। उन्होंने योग का उदाहरण देते हुए भारतीय जीवन-दृष्टि में निहित समग्रता और संतुलन की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और विकसित भारत के निर्माण से जोड़ने का आह्वान किया।

मुख्य अतिथि बिहार के माननीय राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैय्यद अता हसनैन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत पर चर्चा के लिए नालंदा से अधिक उपयुक्त स्थान नहीं हो सकता। उन्होंने नालंदा, राजगीर, बोधगया, वैशाली और विक्रमशिला को ज्ञान, आध्यात्मिकता और बौद्धिक आदान-प्रदान की व्यापक सभ्यतागत भूगोल का हिस्सा बताया।

उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास, प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय शक्ति के पीछे ज्ञान की केंद्रीय भूमिका है और विकसित भारत को केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन, भाषाविज्ञान, धातुविज्ञान तथा शासन सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा के योगदान का उल्लेख किया। राज्यपाल ने कहा कि परंपरा को केवल पुनर्स्मरण करना पर्याप्त नहीं है; आवश्यकता इस बात की है कि उससे समकालीन प्रश्न पूछे जाएँ और आधुनिक विज्ञान के साथ उसका गंभीर संवाद स्थापित हो। उन्होंने भारतीय भाषाओं को शोध, नवाचार और ज्ञान-सृजन की भाषाओं के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

उन्होंने ‘नालंदा दृष्टिकोण’ (Nalanda Approach) की चर्चा करते हुए कहा कि भारत की सभ्यतागत शक्ति ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा, विद्वत्ता और बौद्धिक आदान-प्रदान के माध्यम से वैश्विक साझेदारियाँ बनाने में भी निहित है। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय की नालंदा स्पिरिट, शास्त्रार्थ और सहभागिता जैसी पहलों को ज्ञान को समाज से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन नालंदा भारत की विरासत है, जबकि भविष्य का नालंदा हमारी महत्वाकांक्षा होना चाहिए—एक ऐसा केंद्र जहाँ भारत और विश्व के विद्वान एकत्र होकर जलवायु परिवर्तन, आपदा-लचीलापन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, उभरती प्रौद्योगिकियों, नैतिकता और सतत विकास जैसी समकालीन चुनौतियों पर ज्ञान का सृजन करें।

दो दिवसीय परिसंवाद के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा-बोध, उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेशन, विकसित भारत का सांस्कृतिक आधार तथा आगामी कार्ययोजना सहित विभिन्न विषयों पर सत्र एवं परिचर्चाएँ आयोजित की जा रही हैं। कार्यक्रम का समापन 22 सितम्बर को परिसंवाद प्रतिवेदन, विमर्श के निष्कर्षों एवं आगामी कार्ययोजना के साथ होगा।