“गणित कोई स्मारक नहीं, बल्कि एक संवाद है”: ‘नालंदा स्पिरिट’ व्याख्यान में प्रोफेसर आशीष गुप्ता ने दिखाई भारत की गणितीय यात्रा की झलक….

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | बुधवार, 14 अक्टूबर, 2026: नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित ‘नालंदा स्पिरिट’ फाउंडेशन कोर्स के समापन पर गणित के प्रोफेसर आशीष गुप्ता ने “भावना से अनंत तक” (From Bhavana to Infinite) विषय पर विशेष व्याख्यान दिया। अपने वक्तव्य में प्रोफेसर गुप्ता ने भारतीय गणित के प्राचीन एवं व्यापक इतिहास का अन्वेषण किया और उसे आज की आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से जोड़ा।
प्रोफेसर आशीष गुप्ता ने सबसे पहले यह बतलाया कि सार्वभौमिकता, जिज्ञासा, विचारों का आदान-प्रदान और संवेदनशीलता जैसे विचार किस तरह नालंदा स्पिरिट के अभिन्न अंग हैं। अपनी प्रस्तुति के दौरान, उन्होंने गणित के क्षेत्र में भारत के महान योगदानों के भव्य इतिहास को रेखांकित किया। उन्होंने ब्रह्मगुप्त के प्रसिद्ध ग्रंथ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त में उल्लेखित ‘संयोजन नियम’ (कम्पोज़िशन लॉ) सहित उनके अन्य योगदानों पर चर्चा की। उन्होंने जटिल समीकरणों को हल करने की भास्कर द्वितीय की उत्कृष्ट ‘चक्रवाल विधि’ पर भी प्रकाश डाला। इसके बाद उन्होंने ‘रॉजर्स-रामानुजन सर्वसमिकाओं’ (रोजर्स-रामानुजन आइडेंटिटीज) का जिक्र करते हुए रामानुजन की विलक्षण प्रतिभा के बारे में बात की। प्रोफेसर आशीष गुप्ता ने अपने व्याख्यान का समापन यह बताते हुए किया कि कैसे आधुनिक समय में गॉस और मंजुल भार्गव ने यह सिद्ध किया है कि संरचनात्मक विचारों को विभिन्न गणितीय भाषाओं के माध्यम से पुनर्गठित और सृजित किया जा सकता है। प्रोफेसर मंजुल भार्गव वर्तमान में नालंदा विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड के सक्रिय सदस्य हैं।
यह सत्र आईआईआरएस-इसरो (IIRS-ISRO) डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम के लिए नालंदा विश्वविद्यालय को नोडल केंद्र के रूप में नामित किए जाने का उत्सव मनाने का भी अवसर बना। आईआईआरएस के नोडल समन्वयक प्रोफेसर दीपक कुमार ने इस पहल की बारीकियों पर संक्षेप में चर्चा की और छात्रों को इस कार्यक्रम के तहत शामिल पाठ्यक्रमों से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया।
अपने समापन वक्तव्य में, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने इस बात पर जोर दिया कि रामानुजन से लेकर मंजुल भार्गव तक की गणितीय यात्रा ने गणित के क्षेत्र को एक विशिष्ट पहचान दी है। प्रोफेसर चतुर्वेदी ने भारत की वैज्ञानिक चिंतन की विविध और स्थानीय परंपराओं को पुनर्जीवित करने में मदद के लिए गणित के क्षेत्रीय केंद्रों (केरल, आगरा आदि) को फिर से सक्रिय करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
