पूर्वोत्तर भारत पर विशेष फोकस के साथ नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग 2026 का समापन..

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | सोमवार, मार्च, 2026: नालंदा विश्विद्यालय में आयोजित दो दिवसीय नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग (एनडीडी) 2026 का सफलतापूर्वक समापन हुआ। सेमिनार के दूसरे दिन की शुरुआत एक विशेष सत्र से हुई, जिसमें पूर्वोत्तर भारत को यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स के स्थानीयकरण के सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। नार्थ ईस्टर्न ट्रेनिंग, रिसर्च एंड एडवोकेसी फाउंडेशन (नेत्रा) द्वारा प्रस्तुत विचारों में क्षेत्र की समृद्ध पारिस्थितिकी, सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक कल्याण के संरक्षण के साथ आर्थिक विकास के संतुलन पर जोर दिया गया।
इस आखिरी सत्र में सतत आजीविका के लिए कृषि-पर्यावरणीय पद्धतियों, वन-आधारित उद्यमों, इको-टूरिज़्म और स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही भौतिक, डिजिटल और सीमा-पार संपर्क को मजबूत कर पूर्वोत्तर क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने युवाओं की उद्यमिता, सुशासन में नवाचार और सतत वित्त को 2040 तक एक सशक्त और समृद्ध पूर्वोत्तर के निर्माण का आधार बताया।
इस अवसर पर नालंदा विश्विद्यालय और नार्थ ईस्टर्न ट्रेनिंग, रिसर्च एंड एडवोकेसी फाउंडेशन (नेत्रा) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत में सतत विकास, पारिस्थितिकी संरक्षण और क्षेत्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त शोध, नीति संवाद और ज्ञान साझेदारी को बढ़ावा देना है।
नेत्रा फाउंडेशन की ओर से इस समझौते पर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ रूरल डेवलपमेंट एंड पंचायती राज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष कनक हालोई, तथा नागालैंड विश्विद्यालय के ग्रामीण विकास एवं नियोजन विभाग के विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर जयंता चौधरी ने संयुक्त रूप से हस्ताक्षर किए।
समापन सत्र की अध्यक्षता नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों की चर्चाओं ने यह स्पष्ट किया है कि वैश्विक विकास परिदृश्य तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि भविष्य की विकास रणनीतियों में केवल आर्थिक वृद्धि ही नहीं, बल्कि मानव कल्याण, सामाजिक समानता, पर्यावरणीय स्थिरता और मजबूत संस्थानों को केंद्र में रखना आवश्यक है।
उन्होंने आगे कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए अकादमिक जगत, नीति-निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के बीच सहयोग को और सुदृढ़ करना होगा। नालंदा विश्वविद्यालय ऐसे सार्थक संवाद और साझेदारियों को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
