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#bihar: माटी से मायानगरी और फिर जड़ों की ओर — सिनेमाई बदलाव के नए अग्रदूत बने हैदर काज़मी…

Bykhabretv-raj

Oct 21, 2026

 

 

 

 

 

 

 

माटी से मायानगरी और फिर जड़ों की ओर — सिनेमाई बदलाव के नए अग्रदूत बने हैदर काज़मी…

 

 

 

 

 

 

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​#ख़बरें Tv: भारतीय कला और सिनेमा के इतिहास में सफलता के कई मानदंड गढ़े गए हैं। मायानगरी मुंबई की चकाचौंध में चमकने, फर्श से अर्श तक पहुँचने और शोहरत की बुलंदियों को छूने की कहानियाँ यहाँ आम हैं। लेकिन, सफलता का असली पैमाना वह नहीं है कि आप कहाँ तक पहुँचे, बल्कि वह है कि सफलता मिलने के बाद आप अपनी जड़ों और अपने समाज के लिए क्या वापस लेकर आए। जहानाबाद की माटी से निकलकर सिनेमा की दुनिया में अपनी अनूठी पहचान बनाने वाले अभिनेता, निर्माता और निर्देशक हैदर काज़मी ने इसी दूसरी श्रेणी में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया है।
​हाल ही में जहानाबाद के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जिला प्रशासन द्वारा उन्हें ‘मगध सम्मान’ से अलंकृत किया जाना महज़ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके दो दशकों के उस अनथक संघर्ष की सरकारी और सामाजिक मुहर है, जो उन्होंने कला और अपनी मातृभूमि के नाम समर्पित कर दिया।

*​प्रतिभा पलायन के इस दौर में उम्मीद की किरण*

​यह एक कड़वी सच्चाई है कि बिहार और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में मेधा, कला और प्रतिभा की कभी कोई कमी नहीं रही है। यहाँ के युवाओं की रगों में लोक संस्कृति, नाटक और अभिनय की बयार रची-बसी है। इसके बावजूद, संसाधनों के अभाव और सिनेमाई बुनियादी ढांचे के न होने के कारण यहाँ की प्रतिभाओं को हमेशा महानगरों की ओर पलायन करना पड़ा है। मुंबई और दिल्ली की दौड़, ऑडिशन के धक्के और अजनबी शहरों का संघर्ष कई प्रतिभावान युवाओं के सपनों को बीच में ही तोड़ देता था।
​हैदर काज़मी ने इस विवशता को बहुत करीब से देखा और भोगा था। लेकिन उन्होंने लीक पर चलने के बजाय लीक से हटकर एक नया रास्ता चुनने का साहस दिखाया। जहानाबाद जिले के काको प्रखंड स्थित अलीनगर पाली में 12 एकड़ भूमि पर ‘हैदर काज़मी फिल्म सिटी’ का निर्माण कर उन्होंने केवल ईंट-गारे की एक इमारत नहीं खड़ी की, बल्कि बिहार के युवाओं के लिए उम्मीद का एक नया क्षितिज रच दिया है।

*​इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर इकोसिस्टम तक का निर्माण*

​किसी भी राज्य में सिनेमा के विकास के लिए केवल अभिनेताओं का होना काफी नहीं है, बल्कि उसके पीछे एक पूरा ‘इकोसिस्टम’ होना जरूरी है। हैदर काज़मी ने इस दिशा में ऐतिहासिक पहल की है। पटना, राजगीर और बोधगया के सांस्कृतिक गलियारे के केंद्र में स्थित यह फिल्म सिटी आज राष्ट्रीय स्तर के फिल्म निर्माताओं को आकर्षित कर रही है। अखिलेंद्र मिश्रा और ओमकार दास मानिकपुरी जैसे मंजे हुए बॉलीवुड कलाकारों का यहाँ आकर शूटिंग करना इस बात का प्रमाण है कि बिहार अब सिनेमा निर्माण के लिए एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प बन रहा है।
​इससे भी बढ़कर, फिल्म सिटी के भीतर ‘बिहार स्कूल ऑफ ड्रामा’ की स्थापना एक क्रांतिकारी कदम है। एक बार में 40 स्थानीय युवाओं को अभिनय, निर्देशन और तकनीकी प्रशिक्षण मिलना और उसके तुरंत बाद उनके अपने प्रोडक्शन हाउस के माध्यम से लाइव परफॉर्मेंस व फिल्मों में काम करने का अवसर मिलना—यह सुविधा देश के कई बड़े और महंगे संस्थानों में भी आसानी से नहीं मिलती। यह इस बात का सबूत है कि वे केवल एक फिल्मकार नहीं, बल्कि एक सच्चे मार्गदर्शक और शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं।

*​यथार्थवादी और सार्थक सिनेमा की बयार*

​एक तरफ जहाँ व्यावसायिक चकाचौंध में सतही और मसाला फिल्मों का बोलबाला रहता है, वहीं हैदर काज़मी ने समाज की सच्ची तस्वीरों और गंभीर मुद्दों को अपनी कला का माध्यम बनाया। मधुबनी की शकुंतला महतो की वास्तविक जीवन यात्रा पर आधारित फिल्म ‘बैंडिट शकुंतला’ में खुद असली बैंडिट को मुख्य भूमिका में उतारना, अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों का ध्यान आकर्षित करना यह साबित करता है कि वे कला के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करते। इसके अलावा, शिक्षा व्यवस्था, जातिगत विसंगतियों और लैंगिक असमानता पर प्रहार करती फिल्म ‘चूहिया’, या ‘कजरी’ और ‘ई किल्ड बापू’ जैसी फिल्में यह दर्शाती हैं कि उनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एक सशक्त औजार है।

*​निष्कर्ष: एक विचार का नाम हैदर काज़मी*

​आज जब हम हैदर काज़मी के सफर का मूल्यांकन करते हैं, तो पाते हैं कि उन्होंने सिनेमा को तीन अनमोल उपहार दिए हैं—एक बहुमुखी अभिनेता के रूप में जीवंत किरदार, एक संवेदनशील निर्देशक के रूप में यथार्थवादी कहानियाँ, और सबसे बढ़कर, बिहार की धरती पर फिल्म निर्माण का एक मुकम्मल बुनियादी ढांचा।
​उनका यह सफर देश के तमाम अन्य कलाकारों और प्रबुद्ध नागरिकों के लिए एक खुला संदेश है। यह संदेश देता है कि अपनी माटी की तकदीर बदलने के लिए किसी सरकारी तंत्र के भरोसे बैठने की जरूरत नहीं होती, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर एक अकेला व्यक्ति भी क्रांति का सूत्रधार बन सकता है। हैदर काज़मी ने मुंबई को जहानाबाद तक लाकर यह साबित कर दिया है कि कला यदि जड़ों से जुड़ी हो, तो वह सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि पूरे समाज की तस्वीर बदल देती है।