• Wed. Oct 28th, 2026

#bihar: नालंदा विश्वविद्यालय में आईएएसएसआई का 25वाँ वार्षिक सम्मेलन संपन्न……

Bykhabretv-raj

Oct 28, 2026

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नालंदा विश्वविद्यालय में आईएएसएसआई का 25वाँ वार्षिक सम्मेलन संपन्न; साक्ष्य-आधारित, समावेशी एवं अंतर्विषयक विकास पर जोर…

बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने सार्वजनिक विश्वास, आपदा-सहनीयता और मानव-केंद्रित शासन में सामाजिक विज्ञान की भूमिका पर प्रकाश डाला…

 

 

 

 

 

 

ख़बरें टी वी : पिछले 16 वर्षो से ख़बर में सर्वश्रेष्ठ.. ख़बरें टी वी ” आप सब की आवाज ” …आप या आपके आसपास की खबरों के लिए हमारे इस नंबर पर खबर को व्हाट्सएप पर शेयर करें… ई. शिव कुमार, “ई. राज”- नेशनल टीवी रिपोर्टर–इंडिया Tv, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ स्टेट, इंडिया News, सम्पूर्ण नालंदा जिला -9334598481. नोट :- मेरे अलावा इन चैनलों में और कोई नालंदा जिले से रिपोर्टर नहीं है, अगर कोई बोलता है तो हमें कॉल करके शिकायत करें…

.. हमारी मुहिम .. नशा मुक्त हर घर .. बच्चे और नवयुवक ड्रग्स छोड़ें .. जीवन बचाएं, जीवन अनमोल है .. नशा करने वाले संगति से बचे ..

… हमारे प्लेटफार्म पर गूगल द्वारा प्रसारित विज्ञापन का हमारे चैनल के द्वारा कोई निजी परामर्श नहीं है, वह स्वतः प्रसारित होता है …

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | बुधवार, 28 अक्टूबर 2026: नालंदा विश्वविद्यालय में आज भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान संघ (आईएएसएसआई) का चार दिवसीय 25वाँ वार्षिक सम्मेलन संपन्न हुआ। सम्मेलन में देशभर के प्रमुख विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण और शोध संस्थानों से जुड़े विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं ने भारत की विकास संबंधी प्राथमिकताओं और सार्वजनिक नीति के निर्माण में सामाजिक विज्ञानों की बदलती भूमिका पर मंथन किया गया।

बिहार के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन, आज इस सम्मलेन के समापन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में, सम्मिलित हुए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति-सह-आईएएसएसआई के अध्यक्ष प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी तथा इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

समापन सत्र के मुख्य सम्बोधन में माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने कहा कि सामाजिक विज्ञान अनुसंधान का वास्तविक मूल्य लोगों की समझ को गहरा करने और उनके जीवन को बेहतर बनाने में निहित है। सैन्य सेवा और आपदा प्रबंधन के अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामाजिक समझ, सार्वजनिक विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्थाओं की प्रभावशीलता केवल संसाधनों और परिचालन क्षमता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि लोगों की चिंताओं, आकांक्षाओं और रोजमर्रा की परिस्थितियों को समझने पर भी निर्भर करती है।

बिहार की विकास प्राथमिकताओं पर चर्चा करते हुए राज्यपाल ने राज्य की भौगोलिक स्थिति, प्रवास, आजीविका और क्षेत्रीय विकास की परस्पर जुड़ी चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने उत्तर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि आपदा तैयारी केवल इंजीनियरिंग और पूर्वानुमान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें सामुदायिक व्यवहार, स्थानीय ज्ञान, आजीविका संरक्षण और विस्थापन के दीर्घकालिक प्रभावों को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने सामाजिक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रशासकों और अन्य विशेषज्ञों के बीच सहयोग तथा प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया।

राज्यपाल ने बिहार के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने, युवा विद्वानों के लिए बेहतर मार्गदर्शन और क्षेत्रीय अध्ययन के अवसर बढ़ाने तथा शोध निष्कर्षों को अधिक सुलभ बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कठोर शैक्षणिक कार्यों को व्यावहारिक नीतिगत अंतर्दृष्टि में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें नीति सारांश और हिंदी तथा अन्य प्रासंगिक भाषाओं में संचार शामिल है। नालंदा की समकालीन प्रासंगिकता का उल्लेख करते हुए उन्होंने वर्तमान चुनौतियों—जिनमें डिजिटल पहुंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जिम्मेदार उपयोग शामिल है—के समाधान में संवाद, साक्ष्य और सभ्यतागत समझ के महत्व को रेखांकित किया।

प्रोफेसर एस. महेंद्र देव ने सम्मेलन के व्यापक दायरे—संस्कृति, विकास और डिजिटल भविष्य—की सराहना की और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को मजबूत करने में विविध दृष्टिकोणों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि समावेशी और सतत विकास 2030 के बाद भी वैश्विक एजेंडा का केंद्र रहेगा और भारत अपने पैमाने, आंकड़ों, नीति अनुभव तथा विकास पहलों के माध्यम से इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उन्होंने नालंदा की अंतर-अनुशासनात्मक शिक्षण परंपरा सहित भारत की सभ्यतागत और बौद्धिक विरासत की समकालीन प्रासंगिकता पर भी बल दिया। उन्होंने आईएएसएसआई से अपने संस्थागत विस्तार को बढ़ाने और देशभर में शैक्षणिक आदान-प्रदान तथा अनुसंधान पहलों को बढ़ावा देने का आह्वान किया, ताकि भारत की ज्ञान परंपराओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल परिवर्तन जैसी उभरती वैश्विक चुनौतियों से जोड़ा जा सके।

प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने सम्मेलन के केंद्रीय विषयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विकास को केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं समझना चाहिए; इसमें संस्कृति, मूल्य, सामाजिक संबंध और मानव कल्याण भी शामिल हैं। उन्होंने विकास प्राथमिकताओं को आकार देने में सामुदायिक ज्ञान और जीवन अनुभवों के महत्व को रेखांकित किया तथा क्षेत्रीय असंतुलनों को दूर करने के लिए सार्वजनिक नीतियों के क्रियान्वयन में अधिक समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी विश्वसनीय साक्ष्य, नीति-निर्माण और समाज को जोड़ने की है। स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, जिम्मेदार अनुसंधान, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आंकड़े तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियों पर हुई चर्चाओं ने विकास के एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता को और पुष्ट किया। उन्होंने वक्ताओं, भाग लेने वाले संस्थानों, शोधकर्ताओं, प्रतिनिधियों और आयोजन टीम के प्रति आभार व्यक्त किया तथा कहा कि सम्मेलन के परिणाम सहयोगात्मक अनुसंधान, मजबूत शैक्षणिक साझेदारियों और बेहतर सूचित सार्वजनिक नीति में परिवर्तित होने चाहिए।

प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने कहा कि जटिल सामाजिक चुनौतियों का समाधान केवल अलग-अलग अनुशासनात्मक दृष्टिकोणों से पर्याप्त रूप से नहीं हो सकता। उन्होंने सामाजिक विज्ञान के विभिन्न विषयों के बीच मजबूत सहयोग तथा सामाजिक वैज्ञानिकों और अन्य क्षेत्रों के शोधकर्ताओं के बीच सार्थक संवाद का आह्वान किया। बिहार में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान और शैक्षणिक जुड़ाव को मजबूत करने के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने संस्थागत क्षमता निर्माण, युवा विद्वानों के लिए अवसर सृजन और मजबूत अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन में संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण, सार्वजनिक नीति, सामाजिक परिवर्तन, प्रौद्योगिकी और जिम्मेदार अनुसंधान सहित विकास के प्रमुख आयामों पर चर्चा हुई। विचार-विमर्श में साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण, अंतर-अनुशासनात्मक अध्ययन और आलोचनात्मक चिंतन पर जोर दिया गया। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक प्रभावों को समझने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया।

सम्मेलन ने अनुसंधान, शासन और समाज को जोड़ने में सामाजिक विज्ञान संस्थानों की भूमिका की पुष्टि की। नालंदा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित आईएएसएसआई का 25वां वार्षिक सम्मेलन भारत की विकास प्राथमिकताओं पर विविध दृष्टिकोणों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ और समावेशी, सतत तथा साक्ष्य-सूचित विकास को आगे बढ़ाने में सहयोगात्मक अनुसंधान के महत्व को रेखांकित किया।