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#bihar: नालन्दा विश्वविद्यालय में ‘विश्वरंग नालन्दा 2026’ का शुभारंभ…..

Bykhabretv-raj

Oct 7, 2026

 

 

 

 

 

 

नालन्दा विश्वविद्यालय में ‘विश्वरंग नालन्दा 2026’ का शुभारंभ
भाषा, साहित्य, संस्कृति और कला के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच संवाद को मजबूत करने पर जोर…

 

 

 

 

 

 

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#ख़बरें Tv: राजगीर, नालंदा, बिहार | बुधवार, 7 अक्टूबर 2026: नालन्दा विश्वविद्यालय में आज ‘विश्वरंग नालन्दा 2026’ का शुभारंभ हुआ। ‘पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया: भाषा, साहित्य, संस्कृति एवं कला का संवाद’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम का उद्देश्य भाषा, साहित्य, संस्कृति और कला के माध्यम से भारत तथा एशिया के बीच ऐतिहासिक एवं आज के समय के संबंधों को समझना और नए संवादों को आगे बढ़ाना है।

विश्वरंग फाउंडेशन, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल और नालन्दा विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में हो रहे इस कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में नालन्दा विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. संतोष चौबे, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के उप महानिदेशक डॉ. राजेश रंजन, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव श्री के. श्रीनिवास, आईएएस तथा प्रसिद्ध विचारक एवं मुख्य वक्ता श्री मुकुल कानिटकर ने संबोधित किया।

उद्घाटन समारोह की शुरुआत नालन्दा एवं विश्वरंग पर आधारित फिल्म प्रस्तुति तथा वैदिक स्वस्तिवाचन के साथ दीप प्रज्वलन से हुई। इसके बाद विषय प्रवर्तन, प्रस्तावना और विशिष्ट अतिथि, मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के संबोधन हुए।

विषय प्रवर्तन करते हुए, उद्घाटन सत्र में नालन्दा विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि यह आयोजन नालन्दा की उस भावना को आगे बढ़ाने का स्वाभाविक विस्तार है, जिसमें ज्ञान, उसके वर्तमान उपयोग और भविष्य की संभावनाओं को एक साथ देखने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने नालन्दा को केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि ज्ञान और चेतना के स्रोत के रूप में रेखांकित करते हुए कहा कि विभिन्न देशों और पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थियों के बीच ज्ञान के अंतर्संबंध को मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने भाषायी सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग की दिशा में नालन्दा की पहल का उल्लेख करते हुए बताया कि भाषिणी के सहयोग से हिंदी में दिए गए वक्तव्य का अंग्रेजी और संस्कृत में रियल-टाइम अनुवाद प्रदर्शित करने की व्यवस्था शुरू करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा कि एशिया के बीच वास्तविक जुड़ाव केवल भौतिक अवसंरचना से नहीं, बल्कि लोगों, ज्ञान-परम्पराओं और सांस्कृतिक समझ के स्तर पर भी विकसित होना चाहिए। उन्होंने नालन्दा के Centre for South-East Asian Studies के माध्यम से विश्वविद्यालय-से-विश्वविद्यालय, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक संपर्कों को मजबूत करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वरंग नालन्दा के आगामी सत्र पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंधों के साथ-साथ आर्थिक, व्यापारिक और व्यापक क्षेत्रीय मुद्दों को समझने के नए अवसर प्रदान करेंगे।

ICCR के उप महानिदेशक डॉ. राजेश रंजन ने नालन्दा को साझा ज्ञान और वैश्विक जुड़ाव की जीवंत परम्परा से जोड़ते हुए कहा कि ज्ञान तभी आगे बढ़ता है, जब वह राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाकर संवाद और संबंध स्थापित करता है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया और बताया कि बोडो, असमिया, मणिपुरी, खासी तथा विभिन्न नागा भाषाओं सहित अनेक भाषाओं का संस्कृत, पाली, बर्मी और थाई जैसी भाषाओं से लंबे समय से संवाद रहा है।

डॉ. रंजन ने साहित्य, गीतों और विद्यार्थियों की आवाजाही को देशों के बीच जीवंत सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने ICCR की छात्रवृत्ति और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संपर्कों का उल्लेख करते हुए कहा कि नालन्दा में अध्ययन के लिए आने वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी भारतीय संस्कृति, दर्शन और मूल्यों को समझने में विशेष रुचि रखते हैं। उन्होंने ज्ञान और सांस्कृतिक अनुभवों को साझा करने की भारत की परम्परा को वैश्विक, विशेषकर ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ाव का महत्वपूर्ण आधार बताया।

डॉ. संतोष चौबे, कुलाधिपति, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘विशुद्ध विश्वमित्र’ की भावना को अपने संबोधन का केंद्र बनाया। उन्होंने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की उस दृष्टि को रेखांकित किया जिसमें निर्भय मन, मुक्त ज्ञान और संकीर्ण सीमाओं से मुक्त विश्व की कल्पना है। उन्होंने कहा कि भारत की विभिन्न भाषाएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग होते हुए भी साझा सभ्यतागत जड़ों से जुड़ी हैं। किसी भी भाषा को पिछड़ा या श्रेष्ठ मानने के बजाय उसकी गरिमा और उसके सांस्कृतिक योगदान को समझना आवश्यक है।

डॉ. चौबे ने पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सदियों से चले आ रहे भाषायी एवं सांस्कृतिक संवाद को इसी साझा सभ्यतागत निरंतरता का हिस्सा बताया और कहा कि विश्वरंग इस संवाद को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने भय और संकीर्णता से मुक्त, खुले और संवादशील समाज की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।

मुख्य अतिथि श्री के. श्रीनिवास, आईएएस, सचिव, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने नालन्दा को भारत द्वारा विश्व के साथ अपने ज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत को साझा करने की दीर्घ परम्परा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि आज का आयोजन पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और व्यापक विश्व के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की भाषायी और सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करते हुए भाषा को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परम्परा, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक स्मृति का वाहक बताया। उन्होंने पूर्वोत्तर को भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण ‘हिंज’ बताते हुए ऐतिहासिक व्यापार, प्रवासन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उदाहरणों का उल्लेख किया।

श्री श्रीनिवास ने Act East की भावना को सांस्कृतिक संपर्कों से जोड़ते हुए कहा कि नालन्दा, विश्वरंग, ICCR और अन्य संस्थाओं के प्रयास भविष्य के आर्थिक विकास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सभ्यतागत संवाद के लिए आधार बन सकते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान-परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत के डिजिटल संरक्षण तथा उन्हें वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में प्रभावी रूप से प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया और नालन्दा की ऐसी पहलों में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

मुख्य वक्ता श्री मुकुल कानिटकर ने अपने संबोधन में नालन्दा के पुनरुत्थान को ज्ञान के वैश्विक साझाकरण की परम्परा की पुनर्स्थापना से जोड़ा। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, त्याग, ज्ञान, विविधता और समावेशिता को नालन्दा की मूल भावना के महत्वपूर्ण आयामों के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक बौद्धिकता विविधताओं को पहचानते हुए उनमें निहित एकता को समझने में है। भाषायी विविधता और सांस्कृतिक बहुलता को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में भी विविध ज्ञान-परम्पराओं को संरक्षित करने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने ‘रंग’ को आनंद और दूसरे को प्रसन्न करने की भावना से जोड़ते हुए कहा कि नालन्दा जैसी ज्ञानभूमि से विश्व को ज्ञान, त्याग, समावेश और विश्वबंधुत्व की भावना देने का संदेश आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने नालन्दा की परम्परा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी के हाथों में होने की बात कही और इन दो दिनों को केवल सम्मेलन नहीं, बल्कि साझा आत्मीयता और विश्व-बन्धुत्व की भावना को मजबूत करने का अवसर बताया।

उद्घाटन सत्र के बाद आज विभिन्न अकादमिक सत्रों में दक्षिण एशियाई भाषाओं के सांस्कृतिक अंतर्संबंध और भारतीय भाषाएँ, अनुवाद एवं भाषा समन्वय: परम्परा और विकास, पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्वी देशों की आर्थिक-सांस्कृतिक चेतना तथा नालन्दा की ज्ञान परम्परा और भविष्य के विश्वविद्यालय जैसे विषयों पर विद्वानों एवं विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श हो रहा है।

कार्यक्रम में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से संबंधित चित्रों एवं साहित्य पर आधारित प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया। दिन के समापन पर रवीन्द्र संगीत की संध्या आयोजित की जाएगी। दो दिवसीय ‘विश्वरंग नालन्दा 2026’ का समापन 8 अक्टूबर को विभिन्न अकादमिक सत्रों, बहुभाषी काव्य-पाठ और संगीत प्रस्तुतियों के साथ होगा।